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कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह, परम वीर चक्र (मरणोपरांत)
18 जुलाई 1948 को 6 राजपूताना राइफल्स के सी एच एम पीरू सिंह को जम्मू कश्मीर के तिथवाल में शत्रुओं द्वारा अधिकृत एक पहाड़ी पर आक्रमण कर उस पर कब्ज़ा करने का काम सौंपा गया। हमले के दौरान उन पर एम एम जी से भारी गोलीबारी की गई और हथगोले फेंके गए। उनकी टुकड़ी के आधे से अधिक सैनिक मारे गए या घायल हो गए। सी एच एम पीरू सिंह ने अपने बचे हुए जवानों को लड़ाई जारी रखने के लिए प्रेरित किया और घायल होने के बावजूद दुश्मन के एम एम जी युक्त दो बंकरों को बर्बाद कर दिया। अचानक उन्हें पता चला कि उनकी टुकड़ी में इकलौते वे ही जीवित बचे हैं। जब दुश्मनों ने उन पर एक और हथगोला फेंका, वे लहुलुहान चेहरे के साथ रेंगते हुए आगे बढ़े और अंतिम सांस लेने से पहले उन्होंने दुश्मन के ठिकाने को नष्ट कर दिया। उत्कृष्ट वीरता तथा अदम्य शौर्य का प्रदर्शन करने और सर्वोच्च बलिदान देने के फल स्वरूप कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह को मरणोपरांत परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया। 

 
COMPANY HAVILDAR MAJOR PIRU SINGH, PARAM VIR CHAKRA (POSTHUMOUS)
On 18th July 1948, CHM Piru Singh of 6 RAJ RIF was tasked to attack and capture an enemy occupied hill feature at Thithwal in Jammu & Kashmir. As the attack advanced, they met with heavy MMG fire and a volley of grenades. More than half of the section were killed or wounded. CHM Piru Singh urged the remaining men to continue fighting and destroyed two MMG positions despite being wounded. He suddenly realized that he was the sole survivor. When the enemy lobbed another grenade at him, he crawled forward with blood dripping from his face and destroyed the enemy position before breathing his last. For exhibiting the most conspicuous valour, indomitable gallantry and for making the supreme sacrifice, he was awarded the Param Vir Chakra (Posthumous). 
  
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